बनारस गाथा ( भाग -१ )

ॐ पूर्णमिदः पूर्णमिदम पूर्णात पूर्ण मुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादय पूर्णमेवा वशिस्यते।

इन शब्दों के मायने गूगल पर मिल जायेगे ढूंढ लीजिए, जो इनका तत्व समझ में आए तो मुझको भी समझा दीजिएगा लेकिन अगर इस मंत्र को अनुभव करना हो, जीना हो तो गुरु बनारस आइए। बनारस नाम के इस शमशान से ही सारी सभ्यता निकली है और सारी सभ्यता इसी शहर में घुस भी जाएगी ऐसा मेरा मानना है।

ऐसा लगता है माता सती की मृत्यु से व्यथित महादेव ने यहीं मणिकर्णिका पर माता सती का संस्कार किया होगा और उसके बाद गोदौलिया पे ठंडई पीकर ये निर्णय लिया होगा की गुरू अब यहीं बस जाते हैं, रंडुआ आदमी कहां भटकेंगे। वैसे भी बिना औरत के आदमी को सभ्य समाज में कहां ही जगह मिलती है चाहे वो आदमी महादेव ही क्यों न हों। और जो बाबा बसे यहां पर तो इस शहर में समय रुक गया। अब महादेव के बिना काल हिले भी तो कैसे। काल ने इस शहर को समय परिवर्तन का संदर्भ बिंदु बना लिया। ये ग्रीनविच व्रीनविच की समय रेखा सब लौकिक प्राणियों के लिए है, अलौकिक बनारसियों के ऊपर ये सब लागू नहीं होता। न विश्वास हो तो जाइए मणिकर्णिका घाट पर और देख लीजिए, श्मशान की आग कभी ठंडी नहीं पाइएगा। जिस दिन वो आग ठंडी होगी, मान लेंगे कि महादेव के साथ काल ने काशी को त्याग दिया।डोम और मल्लाह इस शहर के मूल निवासी हैं बाकी सब अप्रवासी है।

ब्राह्मणों की ऐसी कोई विशेष जरूरत इस शहर को नहीं थी। अब आ के बस ही गए तो ब्राह्मण थोड़े डोम हो लिए और डोम थोड़े ब्राह्मण। और विश्वास कीजिए भला ब्राह्मणों का ही हुआ है। बनारस के आखिरी राजा चैत सिंह की फोटो मिले तो देखिए, वो आदमी राजा कम किसान ज्यादा लगता है। फिरंगिया यहीं फंस गया और बेचारे चैत सिंह नपा गए। फिरंगियों को लगा होगा की साला देश भर का आदमी तीर्थ करने बनारस आ रहा है तो रजवा बड़ा पैसहा होगा। अब उसको क्या पता कि यहां के डोम अयोध्यापति राजा हरिश्चंद्र को भी खरीद कर उनसे डोमगिरी करवा लिए थे।अगर उनके ये “बनारस मॉडल ऑफ डेवलपमेंट” समझ में आ गया होता कि यहां की जमींदारी श्मशान पे मुर्दा फूंकने वाले डोमो और नाव खेने वाले मल्लाहों के पास है तो साले मार्क्स के पीछे पगलाए न फिरते। खैर फिरंगियों को अपनी गलती समझ में आ गई है और बनारस की गलियों में पगलाए फिरते फिरगियों की बढ़ती जनसंख्या इसकी गवाह है। लब्बोलुबाब ये की महादेव के इस इस शहर को किसी चीज की जरूरत नहीं है।

लेकिन गुरु जैसे चंद्रमा में धब्बा है वैसे ही धब्बे से बनारस भी अछूता नहीं है और इस धब्बे की भी कहानी है। सुनेंगे?

चलिए सुनाते हैं बनारस कथा।कथा शुरू होती है जब भोगवाद से उबिआये एक राजकुमार ने बीबी बच्चा सब त्याग कर ने कठोर तप किया और गया में खुद का पिंडदान करके खुद को ज्ञानी घोषित कर दिया और बुद्ध कहलाए। अब समस्या इस बात की आई कि स्वयं का पिंडदान करके खुद को बुद्ध घोषित करने से घंट फरक पड़ता है, ये तो हमहू कर सकते हैं, कोई भी कर सकता है। तो अब पब्लिक बुद्ध को बुद्ध माने काहे। तो किसी ज्ञानी ने बुद्ध बाबा से कहा कि बाबा काशी जाओ। अगर वहां वालों से पार पा लिया तो सब सरेंडर कर जायेंगे। तो बुद्ध बाबा गया से चले और सारनाथ में आकर अपना पहला उपदेश दिया और सांख्य दर्शन को उस जमाने में ग्लोबलाइज्ड कर दिया जब ग्लोबलाइजेशन वाले अपना कुत्ता बिल्ली लिए शिकार ढूंढ रहे थे और गुफा में रह रहे थे। आज भी बुद्ध की याद में सारनाथ का स्तूप खड़ा है और एक ईंट तक नहीं हिली है। जाए के देख ल्यो। ये अपने आप में ज्ञानियों के लिए बनारस वालों का टेस्ट बताता है।

बुद्ध बाबा के बाद एक और मठाधीश दक्षिण से कावेरी पार कर अगस्त्य(अगत्तियार) मुनि के दिखाए रास्ते से बनारस आए, ब्राह्मण थे, माता की अनुमति से सन्यास लिया था और काशी के कर्मकांडी पंडितों से शास्त्रार्थ करना चाहिते थे। ये थे अद्वैत दर्शन को भारतवर्ष के कोने कोने में पुनर्सनस्थपित करने वाले आदि शंकराचार्य। इनको भी नही पता था कि काशी का कंकर कंकर शंकर है और बनारसियों ने माया महाठगिनी को साध रखा है तो बाबा एक दिन लपेटा गए। हुआ यों कि बाबा एक दिन गंगा स्नान करके गोदौलिया और अस्सी की तंग गलियों में से किसी एक से लौट रहे थे की एक मेहतर झाड़ू लगाता दिखा। दक्षिण भारतीय मंदिरों के अग्रहारम से निकले ब्राह्मण को दैहिक शुचिता का आभास रहा होगा तो बाबा ने मेहतर से कहा- हट। और गुरु विश्वास कीजिए मेहतर के मुंह से साक्षात महादेव निकले। मेहतर ने कहा- महाराज केका हटायीं, देहियाँ के कि आत्मा के। वेदग्याता शंकराचार्य जिनके आगे देश के ब्राह्मण घुटने टेक चुके थे, जिनके एक आदेश से अक्षौहिणी सेनाएं धर्मध्वजा फहराने को तत्पर थी, सन्न रह गए। शंकराचार्य को ये एहसास हो गया की वो अभी माया से मुक्त नहीं हुए थे। उस मेहतर के मुंह से निकला जवाब आज भी अद्वैत दर्शन की सबसे सरल परिभाषा है।

बाकी सब इतिहास है लेकिन मजाल है कि बनारसियों ने कभी रोब छांटा हो इस बात का। न, कभी नही। “जाए दा गुरू, जवन जेकरे किस्मत में होई ऊ मिलबे करी, देवे वाला महादेव और लेवे वाला भी वही” के भाव से बनारस वहीं खड़ा रहा और आदि शंकर के अद्वैत आंदोलन ने हिंदुस्तान के धार्मिक मानचित्र को बदल दिया।

बनारस को अभी दुनिया को और देना था लेकिन यही फक्कड़पन बनारस को न मिटने वाला दाग भी दे गया। पश्चिम से मौसम बदलने वाली हवाओं के साथ एक ऐसे विचार का बनारस के क्षितिज पर उदय हुआ जिसके एक हाथ में तलवार थी और दूसरे हाथ में ईमान लाने वाली किताब। ये लोग परशिया, मिश्र की सभ्यताओं को नेस्तनाबूद करके आए थे। इस विचार में वाद विवाद का कोई स्थान नहीं था। ये बनारसियों के लिए नई घटना थी। इनके लिए वाद विवाद सब व्यर्थ थे। जिस वाद विवाद ने बनारस के रस को सूखने से बचा रखा था उस वाद विवाद को जिसमे बनारस के प्राण बसते थे तलवारों से खत्म करने का प्रयास किया और बनारस रूपी चांद पर ज्ञानवापी जैसा दाग लगा दिया। महादेव को अपमानित करने का दुस्साहस हुआ।अब बाबा कोई कोठरी के मोहताज तो थे नहीं। वो तो बनारस में हवाओं के साथ बहते थे तो बनारसियों ने इन असभ्यों के साथ भी सामंजस्य बैठाने की कोशिश करी। लेकिन रावण की समझ में आया था क्या, कंस को कोई समझा पाया क्या। नही न तो बनारसियों ने दांव बदला। तुलसी बाबा ने रामचरिमानस लिख कर बनारसियों की मर्यादा को ललकारा। धर्म संस्कृत के चंगुल से निकल कर आम आदमी का हो लिया। श्रीमद्भागवत में लीलाधर ने जब घबराए अर्जुन को “संभवामि यूगे युगे” का उपदेश दिया होगा तो शायद उनका संदर्भ तुलसी जैसे किसी से ही रहा होगा।

लेकिन बनारस का लीजेंड अभी और बाकी था। सबसे बड़ा चमत्कार किया एक गोत्र-कुल हीन जोलहे ने. एक जोल्हे ने धर्म को मंदिरों से मुक्त कर दिया। कपटियों को कहा कि- एक लाख पूत सवा लाख नाती तेहि रावण घर दिया न बाती। सालों किसके लिए इकट्ठा कर रहे हो।एक और बनारसी समर्थ गुरु रामदास ने बाबा का मंतर मराठों में फूंक कर शिवाजी खड़ा किया। जैसे डोम बाबा के गण हैं वैसे ही शिवाजी ने सहयाद्रि के कोलो और भीलों को इकट्ठा कर यवनों को हिंदुस्तान से उखाड़ फेंका और उन्ही मराठों के कुल की अहिल्याबाई होलकर ने बाबा की कोठरी का फिर से निर्माण किया। कबीर ने हिंदुस्थान को बाबा नानक दिए जिनके अनुयायियों ने पश्चिम से आई बीमारी को रोका, बाबा के छत्र को फिर से सुनहरा किया।

ये थी बनारस और बनारस में लगे दाग की कथा। बनारस में दाग लग गया तो लग गया लेकिन ऐसा लगता था कि बाबा नई कोठरी में मस्त हैं लेकिन ऐसा है नहीं। माता सती को महादेव ने जिलाने की कोशिश नही की, कर सकते थे। लाश लेकर नाचने की क्या जरूरत थी। बाबा का छोड़ो, आखिर कहानी कहने वाले का क्या जाता था माता सती को जिलाने में। कलम थोड़े ना घिस जाती। लेकिन अगर माता सती को महादेव जिला देते तो बनारस बनारस कैसे बनता, मणिकर्णिका एक सामान्य श्मशान होकर रह जाता। अरे कैसे कोई प्रियजन का दाहसंस्कार करके ठंडई पी रहा होता ताकि इस प्राकृतिक नियम को उदरस्थ कर सके कि – उड़ जायेगा हंस अकेला जग दर्शन का मेला। महादेव ने स्वयं को प्रकृति के नियमों से ऊपर नहीं माना।

ये महादेव का बनारस और बनारस की कहानी कहने वाले पे उपकार है। लेकिन इसका मतलब ये नही है की बाबा सती के साथ सती हो गए। संसार को भी चलना था तो माता सती को शैलपुत्री होना पड़ा। अब बाबा को पुरानी कोठरी मिले तो बारात निकले और दुनिया का कारोबार चले।महादेव के जिस शहर में बुद्ध, शंकर और कबीर सब साथ रहे और कभी किसी को किसी से दिक्कत नही हुई उस शहर से महादेव को ही उजाड़ने की कोशिश करी। इनको लगा सती का देहांत हुआ तो पार्वती न होगी। बाबा रंडुआ रहेंगे। अरे हाहाकार हो जायेगा जब तक बाबा की बारात न निकलेगी। उन सीखचों से घिरी ज्ञानवापी में क्या खुदा का दम न घुटता होगा। उसको भी ताज़ी हवा चाहिए। बाबा का ब्याह होगा और अल्लामियां भी चलेंगे बारात में, भांग पीकर ही सही लेकिन चलेंगे। बनारस का दाग छूटेगा।

बाबासाहब अमर रहें, कांशीराम अमर रहें।जय भीम जय भारत।

3 thoughts on “बनारस गाथा ( भाग -१ )

  1. अद्भुद अप्रतिम लिखा है।
    प्रशंसा को शब्द नहीं मेरे पास।

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  2. ओमेंद्र जी साधुवाद, बहुत सुंदर और मर्मस्पर्शी कथा लिखी । 🙏💐

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