पूरे भारत को क्या एकता के सूत्र में बांधता है ? ये सवाल लोगों के सामने रखिए तो बड़े सैद्धांतिक तरीक़े के जवाब मिलेंगे । जैसे, इस देश की आत्मा एक है पर ये नहीं बताएँगे की भैया वो आत्मा है क्या ? क्या परिभाषा, कोई ठौर-ठिकाना? ना, इस पर मामला ज़ीरो बटे सन्नाटा। जितना अपना खुद का अनुभव है उससे हमको लगता है की केवल भोले बाबा हैं जो इस देश को एक सूत्र में बांध देते हैं। कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से पूर्वोत्तर भारत, सब जगह भोले बाबा अपने अलग अलग रूपों में विद्यमान हैं, वृहत्तर भारत की बात करें तो भी ये बात ठीक ही बैठती है।
ख़ैर, इतना सीरियस होने का फ़िलहाल नहीं। मुद्दे पर आते हैं । केतकी या केवड़ा के फूल का नाम सुना है? अरे नहीं सुना तो कोई बात नहीं , हम बताए देते हैं । बहुत जबर औषधीय गुणों वाला पौधा है। पर भोले बाबा को इस फूल को नहीं चढ़ा सकते, निषेध है । इसकी एक बड़ी मज़ेदार कथा है, सुनिए : तो हुआ यूँ की भगवान विष्णु, क्षीर सागर में शेषनाग की शैय्या पर लेटे थे । उधर से ब्रह्मा जी गुजरे और उन्होंने यथोचित सम्मान विष्णु जी को नहीं दिया, नतीजा इस बात पर बहस शुरू हो गयी की बड़ा कौन, सृष्टि के सृजक ब्रह्मा या पालनकर्ता भगवान विष्णु। युद्ध की नौबत आ गयी। देवतागण दौड़े दौड़े भोले बाबा के पास पहुँचे। भोले बाबा एक ज्योतिपुंज का रूप रखकर युद्धस्थल पहुँचे । तय ये हुआ की इस ज्योतिपुंज का जो आदि या अंत पता कर ले , वो बड़ा नहीं तो भोले बाबा सबसे बड़े। ब्रह्मा जी और विष्णु जी दोनों चल पड़े । बड़ा समय गुज़र गया, भोले बाबा का कहाँ आदि और अंत पता चले। विष्णु जी हार मान लिए। पर ब्रह्मा जी ने झूठ का सहारा लिया और बोले की उन्होंने देख लिया है प्रारम्भ। भोले बाबा नाराज़, श्राप दे दिए की ब्रह्मा जी की पूजा नहीं होगी और नतीजतन उनके मंदिर गिनती के हैं। ब्रह्मा जी के साथ गवाही देने के लिए केतकी का फूल भी उनके साथ आया था, भोले बाबा ने उसे अपने ऊपर चढ़ाए जाने का ही निषेध कर दिया।
बस यही छोटी सी कहानी है केतकी के फूल के निषेध की, हालाँकि सुगंध और गुणों में वो अच्छी औषधियों की श्रेणी में रखा जाता है। ये फूल जिन चुनिंदा जगहों में पाया जाता है उसमें से एक है, हिमालय की तराई में बसा उत्तर प्रदेश का ज़िला : लखीमपुर ( यूपी ३१ यहीं का RTO कोड है) । अब ये तो नहीं कह सकते की इस शहर को भी केतकी के फूल की तरह कोई अभिशाप मिला है पर ऐसी बहुत सी ख़ासियतें हैं इस शहर की जो इसे शायद थोड़ा ज़्यादा प्रसिद्ध बना सकती थीं, पर ऐसा हुआ नहीं । अब जो नहीं है उसका तो कुछ ज़्यादा नहीं हो सकता, पर जो है उसकी कुछ कुछ बात इस आर्टिकल और आने वाले एक दो आर्टिकल में करने की कोशिश रहेगी।
क्षेत्रफल की दृष्टि से ये उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा ज़िला है, दुधवा नैशनल पार्क है, सबसे ज़्यादा शुगर मिल हैं । शारदा, घाघरा, सरयू, गोमती, कौड़ियाला जैसी नदियाँ हैं। इतिहास से जुड़ी भी काफ़ी जगहें हैं। आज इसी इतिहास से जुड़ी कुछ जगहों के बारे में बात करते हैं।
लखीमपुर के नाम को लेकर भी थोड़े मतभेद हैं, कुछ इसे लक्ष्मीपुर का अपभ्रंश मानते हैं तो कुछ लक्ष्मणपुर का। ऐसा भी कहा जाता है वनवास जाते हुए कुछ समय भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण कुछ समय के लिए यहाँ रुके थे, एक पेड़ पर लक्ष्मण जी ने अपन धनुष बांधा था ,इसलिए ये लक्ष्मणपुर कहलाया।

वैसे रामायण काल/ त्रेता युग की सबसे महत्वपूर्ण जगह गोला-गोकर्णनाथ है इस ज़िले में । अब इसकी कहानी ये है की रावण, भोले बाबा को कैलाश से लेकर लंका चला, भोले बाबा ने शर्त ये रखी की अगर रास्ते में कहीं मुझे ज़मीन पर रखा तो दुबारा नहीं उठा पाओगे, मैं बस वहीं रम जाऊँगा। रावण चल दिया । गोला पहुँच के उसे लघुशंका आयी । वहीं एक चरवाहा अपने जानवर चरा रहा था। रावण ने उसे भोले बाबा को थामने के लिए बोला और खुद शंका समाधान में लग गया। अब आगे की जो कथा है की रावण को शंका समाधान में बहुत ज़्यादा समय लग गया, चरवाहा थक गया और उसने भोले बाबा को ज़मीन पर रख दिया। रावण वापस आया तो भोले बाबा ने चलने से मना कर दिया जैसी की बात तय हुई थी। रावण ने ग़ुस्से में बाबा को, जोकि शिवलिंग रूप में थे, को अपने अंगूठे से ज़मीन में दबा दिया। उसी शिवलिंग की पूजा होती है आज भी। इसे छोटी काशी की महत्ता प्राप्त है।
मंदिरों और लोककथाओं में जो इतिहास मिलता है, उसके मुताबिक़ ये जगह महाभारत काल/द्वापर युग में हस्तिनापुर का हिस्सा थी । पांडवों के अज्ञातवास बिताने का भी उल्लेख यहाँ मिलता है , उनके द्वारा स्थापित आश्रम है और ये जगह अंतर्वेद के नाम से जानी जाती है । पांडवों द्वारा स्थापित कई शिवलिंग भी हैं । गोमती नदी के तट पर टेढ़ेनाथ, जंगलीनाथ , मढियाघाट जैसे लगभग एक दर्जन इसी प्रकार के शिवलिंग हैं। मढियाघाट पर गोमती उत्तर दिशा की ओर बहती हैं, जैसे माँ गंगा काशी में। ज़िले का स्थान , मोहम्मदी ( जो पहले मोहमती के नाम से जाना जाता है) , ये महाभारत क़ालीन राजा विराट की नगरी में आता था । समुद्रगुप्त के समय की घोड़े की एक प्रतिमा भी दुधवा क्षेत्र में मिली है जो वर्तमान में लखनऊ म्यूज़ियम में रखी है। और भी बहुत से शिवलिंग हैं, आस पास के क्षेत्र में, जैसे बाबा गुप्तिनाथ, ये शारदा नदी के तट पर एक बड़े से पेड़ की जड़ में विराजमान हैं ।
धौरहरा एक जगह है , यहाँ राम वाटिका है । ऐसी मान्यता है की यहाँ तुलसीदास जी रुके थे और बालकाण्ड की रचना की थी। उनका रोपा हुआ, बरगद का पेड़ अभी भी है।

क़रीबन २०० साल पुराना और अपने आप में अनूठा मेढक मंदिर है ज़िला मुख्यालय से सटे ओयल क़स्बे में। मंडूक तांत्रिक शैली में बने इस अनूठे शिवमंदिर में जो शिवलिंग है वो अपना रंग बदलता रहता है । नंदी बाबा की जो मूर्ति है उसमें नंदी बाबा खड़े हैं, ये भी बहुत कम जगह मिलने वाली घटना है। मंदिर में जो कुआँ है, उसका पानी बाक़ी पड़ोस के कुओं से ज़्यादा मीठा बताया जाता है। कहते हैं, मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो पाया, वरना ये चलायमान मंदिर होता। पूरा मंदिर एक मेंढक की पीठ पर स्थापित है।
बात करने बैठे लोगों से, तो और भी बहुत कुछ जानने को मिला जो इस लगभग अंजान शहर के बारे में मुझे भी नहीं पता था, जबकि पैदा भी यहीं हुए, पले बढ़े भी यहीं। मुझे भले ही आज ये केतकी के श्राप जैसा कुछ कुछ केवल अपने शहर के बारे में लग रहा हो, पर कमोबेश हिंदुस्तान के लगभग हर शहर की यही कहानी है। इस देश का इतिहास बिना धर्म की बात किए नहीं समझ आ सकता और धर्म की बात बहुत से तथाकथित सेक्युलर लोगों के अजेंडा में फ़िट बैठती नहीं, इसलिए ऐसे शहर और उनका इतिहास तिल तिल ख़त्म हो जाने को मजबूर है।
ख़ैर, ये सब तो फिर से गम्भीर बातें हो गयीं । अभी मुझे और भी बहुत कुछ बताना है मेरे शहर के बारे में, जो अगली कड़ी में बताऊँगा । तब तक अपना ख़याल रखिए । भोले बाबा सबका भला करें!!!!
वाह शानदार😊😊😍👏🏼👏🏼
मोहम्मदी से लेकर ओएल धौहरारा तक का शानदार विवरण सरल शब्दों में
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शानदार❤️❤️❤️
बस अगर एडिट हो सके तो शहर की बातो की जगह जिला शब्द प्रयोग कीजिये😀😀
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वाह , शानदार प्रयास अपनी मिट्टी पर जमी धूल को शब्दों के माध्यम से हाटने की, लिखते जाइए पढ़ने वाले जुड़ते जाएँगे❤️
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