बनारस गाथा ( भाग २ )

किसी जमाने में मैने जीवन के तीन चार साल अपने ट्यूबवेल पे ही अपने बाबा के साथ बिताए। उन वर्षों के बाद, न तो वैसे दिन देखे न वैसी रातें। बनारस में दो वर्ष रहे लेकिन हर हफ्ते महीने गांव निकल ही जाते थे। गांव जाने के पहले इलाहाबाद रहे जहां पैदा भए और जहां इतना आतंक फैला दिए थे कि पिताजी ने घर निकाला दे दिया और चैन की सांस ली। जिंदगी के दस बरस मुंबई आईआईटी को दिए ये सोचकर कि हो सकता है कुछ बेहतर सीखने को मिल जाए। बनारस और मुंबई से क्या मिला इसको दो संस्मरणों में समेट देते हैं –

बीएचयू में परीक्षा की तैयारी काशी विश्वनाथ मंदिर में बैठ के करते थे। नया नया मोबाइल फोन मिला था जिसमे गाना रिकॉर्ड होता था और मुझको नुसरत साहब बड़े पसंद थे तो पूरे भोकाल से मंदिर के अंदर बैठ कर अल्लाहु अल्लाहु बजाते थे और पढ़ते थे । कभी किसी ने रोका नहीं। ये बनारस था, महादेव का गांव। इस शहर को अपने पे इतना आत्मविश्वास था कि जो साला सा रे गा मा पा पे गला फाड़ रहा है वो ब्राह्मण ही है। आखिर राग रागिनियां किसी गैर ब्राह्मण को ब्राह्मण के अलावा किसने सिखाई होंगी। गाना बजाना करने वालों के लिए संरक्षण बहुत जरूरी है तो जो लोग गाते बजाते थे उनको गांव शहर राजे रजवाड़ों के द्वारा संरक्षण मिलता था। राजे महाराजों का धर्म बदला तो संरक्षण की मजबूरी में गवैया बजइया ने अपना धर्म भी बदल दिया लेकिन कला को जिलाए रखा। जो में गलत कह रहा हूं तो तुर्क अभी भी क्या गाते हैं ये यूट्यूब पे सर्च करके देख लीजिए और वो भी इस्लाम से पहले का ही है क्योंकि इस्लाम में नाचना गाना बजाना सब हराम है। इस विकट धर्म में प्रसन्न होना ही गुनाह है।बनारस ने बस यही यकीन दिया कि गुरु चौड़े रहो काहे कि महादेव के परे कुछ नही है। जो है सो महादेव का ही है। तो यहां बिस्मिल्ला बजाते हैं और गिरिजा गाती हैं कि – बरसान लागी बदरिया रूम झूम के और सामान्य सी मौसमी गतिविधि विशिष्ट हो उठती है, इठलाने लगती है, शहनाई के निकलते सुरों से होकर ब्रह्म उतर जाता है बारिश की बूंदों में। आज भी सुबह सूरज निकलने से पहले अस्सी घाट से दशास्वमेघ घाट पैदल विचारिये और अट्टालिकाओं से आता संगीत आपको बता देगा कि सुबह ऐ बनारस का क्या मतलब है। दुनिया के शायद ही किसी और शहर को संगीत के सुरों में लबरेज सुबह नसीब है। इसी नशीली सुबह का नशा उतारने के लिए बनारस वाले भांग पीते हैं।तो आखिर बिस्मिल्ला खान मंदिर में बैठ के बजा सकते हैं तो मैं अमरेंद्र सिंह बाबा विश्वनाथ के दरबार में नुसरत फतेह अली खान को सुन काहे नही सकता। कौन रोकेगा, महादेव ने स्वयं ये अधिकार दिया है। महादेव की ऐसी हरकतों ने मेरे अंदर ऐसा बनारस घुसेड़ा ऐसा बनारस घुसेड़ा कि अब जब काठ पे रखा के फूंक जायेंगे तभी शायद अंदर का बनारस हवा हो। और जो कोरोना ने लील लिया तो गीली लकड़ी पे सुलग लेंगे कबीर की तरह ये कह के कि –लकड़ी जल कोयला भई कोयला होए गया राख , मैं पापी ऐसा जला कोयला भया न राख

दूसरी चीज जो बनारस ने दी वो थी महाराजा सयाजीराव गायकवाड पुस्तकालय। घुसते ही चेतावनी लिखी रखी थी जो शायद मालवीय बाबा का मजा लेने का अपना तरीका रहा होगा। क्या ? ये कि – साकी की मोहब्बत में दिल साफ हुआ इतना, जब सर को झुकाता हूं आइना नजर आता है। भगवान जाने किसने लिखी है ये लाइनें लेकिन समझ में आईआईटी में डॉक्टरेट करने के दौरान ही आई। इत्ती किताब, इत्ती किताब, इत्ती किताब की गिनने बैठें तो चार पांच बरस उमर निकल जाए। दो बरस गर्मियां विश्वनाथ मंदिर से केंद्रीय पुस्तकालय के बीच ही कटीं। अब मालवीय बाबा को धन्यवाद करके शर्मिंदा नहीं करेंगे लेकिन सीर के अहिरों और बनारस के आस पास के राजपूतों से पूछिए कि बीएचयू क्या है। अहीरों और राजपूतों की इतनी बौद्धिक प्रजाति (सरकारी आरक्षण का फर्क न हो तो दोनो बैल जातियां हैं) शायद ही कहीं मिले जितनी बीएचयू के आजू बाजू मिलेगी और सरकारी नौकरी को में बौद्धिकता का प्रमाण नहीं मानता तो ज्यादा टेर लेने की आवश्यकता नहीं है।फिरंगों को महादेव का आदेश ही था की उन्होंने प्रयाग में विश्वविद्यालय बनाया और बनारस में विश्वविद्यालय के लोकार्पण को मालवीय बाबा के ऊपर छोड़ दिया। गंगा किनारे के वो बंजर बलूहे गांव आज हिंदुस्तान में ही नहीं दुनिया में सबसे ज्यादा उर्वर हैं और सबसे नायाब फसल उगाते हैं। छै गो तो भारत रत्न है अकेले इस प्रांगण से। बनारस ने हमारा कुछ लिया नही, जो जो गुण और लक्षण लेके आए थे उसके ऊपर जितना ले सके केवल दिया। वाराणसी स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर पांच के बुक स्टॉल की कहानी फिर कभी।

अब आते हैं बंबई पर। बंबई के पहिले जेएनयू, हैदराबाद विश्वविद्यालय आदि आदि में भी एडमिशन हुआ था लेकिन आईआईटी का भोकाल अलग था और उससे भी बड़ी बात थी कि आठ हजार रुपिया वजाफ़ा मिल रहा था जो हमारी औकात से बहुत ज्यादा था। इतना रुपया एकसाथ हम केवल अपनी अम्मा के मरने के दौरान देखे थे। चेक देखे थे लेकिन गुरु रुपया अपने हाथ में आने का रुआब ही दूसरा है। लेकिन जब बंबई पहुंचे और उस शहर का मिजाज देखे तो समझ आ गया की भैया यहां रहाइस मुश्किल है। हम ठहरे पान खाने वाले आदमी और ये सिगरेट फूंकने वालों को बुद्धिजीवी समझने वाला शहर। पान मिले भी तो साला दो कौड़ी का। शुद्ध मजदूरों का महानगर। इसी शहर के लिए शायद हरिबंस राय बच्चन लिख गए –क्या महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,अश्रु, स्वेद, रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ,अग्निपथ, अग्निपथ, अग्निपथ। २०१० का सर्दियों बखत था और एम फिल में हम नए नए थे। बाबरी मस्जिद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का निर्णय आया और एक समाजशास्त्र के प्रोफेसर जिनका नाम कुशल देब है, जो अब आईआईटी बॉम्बे के मानविकी एवं सामाजिक विज्ञान संकाय के विभागाध्यक्ष भी हैं, ने पकड़ा और बड़े मजा लेने वाले भाव से पूछा क्या रै केवल दो हिस्सा ही मिला तुम लोगों को। न तो मेरे अंदर कोई पूर्वाग्रह था न ही मैंने उनके सवाल को किसी वैचारिक दुराग्रह से ग्रसित होके सुना या समझा, ना ही उस समय तक मैं वैचारिकी के वाद को समझता था और सिवा बीएचयू का होने के मैने उनको कारण भी नही दिया था ये सवाल पूछने का क्योंकि आंग्ल वाकपटुता से भरी मेरी क्लास में मैं चुपचाप बैठने में ही भलाई समझता था। लेकिन महादेव तो महादेव हैं। पट्ट से महादेव मुंह से निकले – सर! बाकी जो बचा है वो भी ले लेंगे। गुरुजी सिटपिटा गए तुरंत ऑफिस से बाहर निकल रहे एक बंगाली अर्थशास्त्र के प्राध्यापक को इशारा कर के बोले – सुन रहे हो क्या बोल रहा है। ये मुंबई में मेरा baptism था। पहली बार समझ आया की मालिक यहां तो कपड़ा रंग देख के पहनना होगा, बोली सामने वाले का वाद देखकर बोलनी होगी। फिर तो ये खेल ८ साल चला लेकिन बदल ना पाए आईआईटी बॉम्बे में भारत सरकार के नियुक्त शैक्षणिक क्लर्क हमको ठीक उसी तरह से जैसे इरफान वाले पान सिंह तोमर के बागी मामा को पुलिस कभो न पकड़ पाई। उन्ने चंबल को पानी पीबो हतो और हम गंगा क पानी पीयले रहलीं। वो बागी हते हमहू बागी रहलीं। वो भी राजपूत हते, हमहू राजपूत बानी। जियो बुंदेलखंड । बारह बरस ले कुक्कूर जीवे सोरह बरस ले जिए सियार । बरस अठारह क्षत्रिय जीवें बाकी जीवन को धिक्कार बड़े लड़ैया महोबे वाले…मुंबई पर फिर कभी।

अभी फिर चलते हैं गांव। किताब पढ़ना एक बात है, उसको समझने और समाज पर आरोपित करने के लिए समाज जानना सबसे ज्यादा जरूरी है। बहुतेरे दिल्ली बंबई के डॉक्टरेट यहीं फेल हो जाते हैं क्योंकि खुद के शोध को उन्होंने कभी जमीन पे उतर कर नही समझा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सफल होने की सबसे बड़ी वजह यही जमीन पर समाज के बीच में बने रहने की कवायद है और कांग्रेस और वामपंथियों की बौद्धिक फौज के वीर्यहीन होने का यही कारण है कि वो केवल कमेंट्री करते हैं। पिछली बार उनके अब्बा सड़क पर उतरे थे और अम्मा के गर्भ से सारे क्रांतिकारी अभिमन्यु बन के निकले हैं। वो कहा है न – सौ पढ़ा पे एक कढ़ा भारी। अभी भी आप देखेंगे कि मरते लोगों के बीच कौन खड़ा है और कौन श्मशान और कब्रिस्तान का फर्क समझा रहा है तो आपको चमक जायेगा चम्पू कौन है।

आज जितना भी सोच लेते हैं वो गांव के ट्यूब वेल पर बिताए उन्ही एकाकी दिनों और उन लोगों, जिनसे ट्यूब वेल पर मिले, बतिआए, की वजह से ही है। वो दिन खुद को जानने के थे। दुनिया की निगाह में बर्बाद थे। १५ साल की उमर के बाद की जिंदगी केवल सड़कों पर बिताए थे। नैनी इलाहाबाद का कुत्ता बिल्ली सब जानता था, करछना से महेवा तक। इंटरमीडिएट में पुराने यमुना पुल पे बैठ कर केवल ट्रक गिने। पढ़ाई ने सिर्फ तथ्यों को करीने से लगाना सिखाया बाकी सारा व्याख्यान इन्ही सड़कों से लिया। आज भी सड़क नापना सबसे पसंदीदा शगल है। बुद्धिजीविता का लबादा अपने बस का नहीं। मेरा स्कूल में एक भरीन के हाथ का बना खाना खाना गांव के लिए एक खबर थी जिसका मेरे फक्कड़ बाबा पे घंट फरक नही पड़ता था। बाबा हमारे कबीरपंथी भी रहे उसके बाद औघड़ाई भी किए। तो केवल उम्र का अंतर था बाकी दोनों प्राणी का इंटीरियर डेकोरेशन सिमिलर था। हम तो खैर पैदायशी कुजात थे। उस जमाने में उत्त पदेश में बिजली सिर्फ आठ घंटे आती थी वो भी सिर्फ हमारे इलाके में क्योंकि सप्लाई आजमगढ़ से थी जो श्री मुलायम सिंह यादव का चुनाव क्षेत्र था। एक हफ्ते दिन में और एक हफ्ते रात में वो भी तब जब ट्रांसफार्मर सही सलामत हो। इसलिए पढ़ने का एकमात्र साधन लानटेन थी।

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ट्यूबवेल के पीछे बुजुर्गों ने एक गड़ही खुदवाई थी जो मिट्टी के नीचे कांकर आ जाने के कारण अधूरी छोड़ दी गई थी और उसी के दूसरे किनारे पर एक छोर से दूसरी छोर तक बांसवार थी। ट्यूबवेल के घर से ही सटे आम का एक घना पेड़ था जिसकी डालें आम के मौसम में जमीन छूने लगती थीं। बाकी शीशम, नीम और सागौन के पेड़ थे। स्कूल से लौटने के बाद राजा बनारस ट्यूबवेल से गड़ही में पानी भर देते थे और आम के पेड़ के नीचे बासखट्टी लगा के जून की दोपहरी में लेट जाते थे। जून की पछुआ जब बांसवार और पानी से गुजरती थी तो माहौल वातानुकूलित हो जाता था। इस मौसम में अपना भोजन आम से चूने वाला पक्का था।

महादेव की महिमा, मुंबई से गांव पहुंचे ही थे की ६ महीने में शिक्षामित्र की नौकरी मिल गई। ३००० रुपया महीना तनख्वाह और गांव के सवर्णों के लिए ये ईर्ष्या का विषय था। हो भी क्यों न, बाहरी थे। ग्रामीण समाजवाद से ये पहला परिचय था। लेकिन बड़ी तमीज से रहना पड़ता था क्योंकि मास्टर हनुमान सिंह के घर से थे।इसके बाद दिन गांव के भरों और चमारों के लड़कों के साथ साथ कट जाते थे और रातें शफ्फाफ काले आसमान में उजले तारे देखते। उतना साफ आसमान फिर कभी नहीं देखे।

कहां मिलेगा ये सुख और बंबई वालों को लगता था कि पैसा देकर बांध लेगा। बताइए भला ।आगे फिर कभी अभी शब्बा खैर !!

कोरोना से घबराएगा मत। आपने और हमने इससे ज्यादा बड़ी आफतें देखी हैं। याद कीजिए उस वक्त को जब आपको लगा हो कि हे महादेव अबकी बचा दिए तो काशी विश्वनाथ दर्शन करेंगे। तो वैसे ही फिर से बाबा की मनौती मानिए। मान गए तो ठीक नहीं तो बाबा के पास ही तो जाना है। काहे का डर। देखिए फैज़ साहब कितना तरीके से समझा गए हैं –माना कि ये सुनसान घड़ी सख्त घड़ी है,मगर मेरे दिल, ये घड़ी तो फकत एक घड़ी है,हिम्मत करो! जीने को अभी उम्र पड़ी है

।।ओम पार्वती पतये हर हर महादेव।।

चमक चंपुओं को सुनते रहिए ताकि डर लगता रहे, ऐसे मौसम में सेहत के लिए अच्छा है लेकिन मरीजों को चमक चंपुओं की कमेंट्री से दूर रखिए उनके लिए ठीक नहीं है।

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